गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तुम्हारा शहर


इस शहर में दिन बिताना हुआ मुश्किल
बरसते है पत्थर सर बचाना है मुश्किल।
बारिश के बूंद से पड़ जाते है छाले
ऐसे तमाशे से मुझको बचा ले।
सच्ची है बात मानो न मानो
अब तक तो जिन्दा हु आगे तुम जानो ।
तुम्हारा शहर अब तुम्हारे हवाले
मुझको पड़े है अब जान के लाले ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कल 30/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. bahut achcha likha hai...hmm shahri jeevan kuch aisa hi hai...kripya comment moderation hata le taki sabhi aasani se comments kar paye :)

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  3. हलचल के माध्यम से आज पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर अच्छा लगा आपकी यह रचना पढ़कर समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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