मंगलवार, 28 सितंबर 2010

ऐसे ही मोक्ष देती रहो माँ


गंगा को मोक्षदायनी यु ही नही कहते ,हकीकत में माँ गंगा सदियों से हमें मोक्ष देती आई है .उनका तो पृथ्वी पे आगमन ही सागर पुत्रो को मोक्ष देने के लिये ही हुआ था । गंगोत्री से गंगा सागर तक के अविरल कल कल यात्रा में माँ गंगा हमें कई रूपों में मोक्ष देती है ,कहीखेत के लिये पानी तो कही पीने के लिये, हर जगह माँ हमें तृप्त करती आ रही है ,बनारस के घाट हो या संगम का किनारा चाहे हरिद्वार का तट हर जगह माँ हमारे पाप धोती है इतना ही नही गंगा माँ अपने किनारे रहने वाले गाव कसबे शहर की आबादी को अपने माध्यम से रोजगार देकर भी मोक्ष दे रही है ,चाहे गाव में गंगा में मछली मरने वाला हो या पूजा पाठ कराने वाले पंडे ,लाश जलाने वाले डोम हो या नाविक ,माँ सभी को किसी न किसी रूप में मोक्ष दे रही है ,अब तो इधर कुछ वर्षो से माँ बड़े नेताओ अधिकारियो स्वयसेवी संस्थाओ के लोग और सामाजिक कार्यकर्ताओ को भी मोक्ष देने लगी है ,इस नए वर्ग को माँ १९८८ से तब मोक्ष देने लगी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने गंगा प्रदुषण परियोजना की शुरुआत की थी

इस परियोजना में अब तक अरबो खर्च हो गए लेकिन उसके बाद भी लगातार मैली होती जा रही गंगा माता ने कभी शिकायत नही की बल्कि इस परियोजना के पैसे से लोगो को मोक्ष देती रही ,न जाने कितने अधिकारी ,कर्मचारी ,सामाजिक कार्यकर्त्ता लगातार मोक्ष की ओर बढ़ रहे है इसकी गिनती नही है

,तुलसी घाट किनारे रहने वाले महंथ बीरभद्र जी को भी माँ ने खूब मोक्ष दिया ,आख़िर वो भी कितना करते है माँ के लिये हर साल ५ जून को सैकडो बच्चो को एक दुसरे का हाथ पकड़ा कर घाट पे खड़ा कर देते है ,बड़े बड़े सेमिनार करते है बिल क्लिंटन से मिलते है ,सो उन्हें थोड़ा ज्यादा मोक्ष मिलना चहिये हो सकता है मिल ही रहा हो ।

आजकल माँ, स्वामी अविमुक्तेश्वर नन्द को भी खूब मोक्ष दे रही है वो तो बनारस से लेकर संगम तक मोक्ष लेनें में लग गए है लगातार काम कर रहे है सो इन्हे भी मोक्ष मिलना चाहिए आख़िर क्यो न मिले जब बाबा रामदेव गंगा पे बोल सकते है तो घाट पे रहने वाले क्यो न ले ,

इस बिच बनारस में कुछ मोक्ष लेने वालो ने न जाने क्यो मोक्ष पाने का प्रयास ही बंद कर दिया ,उनमे से एक है रामशंकर जी पेशे से पत्रकार है गंगा किनारे रहते है कुछ साल पहले रक्षत गंगाम आन्दोलन शुरू किया लेकिन लगता है तब तक गंगा का सारा मोक्ष समाप्त हो चुका था सो रामशंकर जी वापस हो लिये ,नये मोक्ष खोजने वालो में एक ज्योतिष लक्ष्मण शास्त्री भी है जो कई सच्ची भविष्यवाणी करने का दावा करते है लेकिन ये कभी नही बतया की माँ कब तक प्रदुषण से मुक्त होगी इधर कुछ दिनों से माँ को प्रदुषण मुक्त कर मोक्ष पाने वालो ने नए उत्साह से काम शुरू कर दिया क्योकि केन्द्र सरकार ने भी गंगा के लिए कुछ कर बदले में मोक्ष पाने के प्रयास शुरू करते हुए माँ गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है .इतना ही नही अभी कुछ दिनों पहले विश्व बैंक से माँ गंगा के सफाई के लिये ३ बिलियन डालर की सहायता मिली है ,निसंदेह इस बड़े धन से माँ गंगा का प्रदुषण समाप्त हो या न हो लेकिन इतना तय है की सदियों से हमें मोक्ष देने वाली माँ फिर एक काफी बड़े वर्ग को मोक्ष देने जा रही है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. हम उसकी वंदना करते हैं जिसकी वंदना धरती और सारे धरतीवासी करते हैं आप भी उसी की वंदना कीजिये .

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  2. एक अच्छी पस्तुति, सराहनीय विवेचन.

    गंगा हमारी संस्कृति है
    जो विष्णु के नख से निःसृत हो
    जा समाई ब्रह्मा के कमंडल में.
    और जब निकली कमंडल से बन के,
    वेगवती - रूपवती - प्रलयंकारी,
    जा उलझी खुली जटाओं में शिव के.
    इस प्रकार गंगा योजक है -
    भारतीय संस्कृति के नियामक त्रिमूर्ति का.
    हमारी आस्था - विश्वास और भावनाओं का.


    गंगा है आस्था
    और विश्वास का अटूट संगम,
    केवल गंगाजल ही है समर्थ,
    तारने मैं राजा सागर के भस्मीभूत
    हो चुके सहस्रों लाडलो को.
    इसलिए गंगावतरण बन गया था,
    एक पवित्र मिशन भगीरथ के लिए.
    भगीरथ की सफलता के बाद
    गंगा बन गयी - 'भागीरथी'.
    तारनहार और पालनहार!!
    हो गयी सुलभ जनसामान्य के लिए,
    और बन गयी है प्रबल केंद्र,
    आस्था का, श्रद्धा का, विश्वास का ..

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