मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

आमने सामने

अबकी बार बात, आमने सामने होगी। 
मै भी तो देखू,कैसे आँखे झूठ बोलती है।

बात

बात अधुरी न छोड़ा करो
मेरे जागते न सोया करो
गर उजाले मे ना मिले 
अन्धेरे मे हाथ बढाया करो।

मंगलवार, 15 मई 2012

वक्त

अजनबी भला हम कब थे
वक्त ने जुबा पे पहरा बिठा रखा था
तुम जब सामने होते थे
हम असमान झाका करते थे
अजनबी कभी न थे तुम
वक्त ने आँखों को शून्य बना रखा था

बुधवार, 9 मई 2012

सफर

अब और चलना भला हम कहा चाहे
क्या करे लेकिन मिलता नहीं कोई ठिकाना।
सच कहू अब और चला जाता नहीं
उफ़! मगर ठौर कोई भाता भी नहीं।


शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

जिन्दा हू

बिन तुम्हारे,जिन्दा हू आजतक,

तुम्हे हो भले यकीं,मुझे नही होता।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

काम

हम निकम्मे हुये अपनो के
काम एसा थमा दिया तुने,
बेहतर था ठुकरा देती हमे
कुछ शेर लिखकर गालिब़ ही कहलाते।

तुम्हारा शहर


इस शहर में दिन बिताना हुआ मुश्किल
बरसते है पत्थर सर बचाना है मुश्किल।
बारिश के बूंद से पड़ जाते है छाले
ऐसे तमाशे से मुझको बचा ले।
सच्ची है बात मानो न मानो
अब तक तो जिन्दा हु आगे तुम जानो ।
तुम्हारा शहर अब तुम्हारे हवाले
मुझको पड़े है अब जान के लाले ।

जीवन

सपनो के लिये सोना पड़ता है
पाने के लिये कुछ खोना पड़ता है।
खोकर भी गर ना मिला कुछ
सच मानो,
जीवन को फिर ढोना पड़ता है।

वक्त

पढा तो जाउगाँ मै भी एक दिन
लेकिन सिर्फ शायरी की तरह।
जानता हू मुझको भी एक दिन
वक्त बदल देगा डायरी की तरह।

रिश्ते

रिश्ते दर्द देते है,
ना बने तो बेहतर।
कट ही जायेगी यू ही जिंदगी
बियाबान मे चलते चलते।

राज

दिल में कुछ राज अब भी दफ़न है
साथ जाएगा मेरे ,मेरा तो वही कफ़न है

मुहब्बत

सुना था मुहब्बत सिर्फ किताबो में होती है
जीवन को हमने एक किताब बना डाली।
पन्ने पन्ने पे दिखेगा लिखा नाम तुम्हारा
बस एक बार आँखों को बंद करके तो पढो ।

यहाँ मत आओ

तुम शहर के लोग यहाँ मत आओ
मै गाव हु शहर यहाँ मत बसाओ।
साँझ ढलते सो जाते है हम
सारी रात अब हमें न जगाओ ।
बहुत दिन से सोया नहीं
मै सो रहा तुम भी सो जाओ
मै गाव हु शहर यहाँ मत बसाओ ।

तुम क्या जानो

छू कर हाथ तुम्हे जल जाता
काश समझ ये मुझको आता,
तुम क्या जानो सिवाय स्पर्श बिन
मन कैसे उसर बन जाता ।

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

हदो को जानते है,

फिक्र ना करो हम हदो को जानते है,
तुमको पहचानते है खुद को भी जानते है।
सागर की लहरो को पहचानते है 
किनारो को बाखुबी जानते है,
कितने डूबे कितने बह गये
हर एक को जानते है
जो हसता है,जानते है 
कौन डसता है पहचानते है
उड़ते उड़ते फलक मे खो बैठे पंखो को
इसलिये कहते है,फिक्र ना करो,
सरहदो को हम पहचानते है।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

रेत की दीवार

खड़ा हुआ जिसके सहारे
वो आ गिरा मुझपर ।
कहा खबर थी 
ये रेत की दीवार है ।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

तुम्हारा शहर अब तुम्हारे हवाले ।

इस शहर में दिन बिताना हुआ मुश्किल
बरसते है पत्थर सर बचाना है मुश्किल।
बारिश के बूंद से पड़ जाते है छाले 
ऐसे तमाशे से मुझको बचा ले। 
सच्ची है बात मानो न मानो
अब तक तो जिन्दा हु आगे तुम जानो ।
तुम्हारा शहर अब तुम्हारे हवाले
मुझको पड़े है अब जान के लाले ।

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

तेरे शहर में

हम तो तेरे शहर में आये थे जीने के लिये 
जीने तो तुने न दिया न छोड़ा मरने के लिये   

तैयार तो मै  यु ही था  खुद को खोने के लिये 
खोद तुने मेरा  कब्र दिया, चैन से सोने के लिये 

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

पुरी कहानी ।


तुम्हे जो दिखता सिर्फ एक बुंद पानी है,
मेरे जीवन की ये पुरी कहानी है।
तुम्हारे बिना येअधुरी जवानी है,
मेरी कहानी कि सिर्फ यही निशानी है।

बुधवार, 25 जनवरी 2012

पत्थर दिल

हिलते डुलते पत्थरो को जो इनसान समझ लेते है,
चोट मिलने पर हम कहते है,वो तो पत्थर दिल है
आदमी को आदमी नही समझते,
पत्थर पर रोज माथा पटकते है,
चोट तो लगनी है ,चीख भी निकलेगी,
नाहक इस तरह चिल्लाया न करो।